समकालीन हिन्दी कहानियों में दलित विमर्श
WitWaves Journal of Multidisciplinary Research, Volume 3, Issue 2, 2026, 52c383ae-806d-4d69-87ae-ad91ff91849c
https://doi.org/10.64175/wjmr.vol.3.issue2.8
Published: 20 June 2026
Abstract
साहित्य किसी जाति, धर्म या वर्ग का साहित्य नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता की बात करने वाला साहित्य है। साहित्य ब्रह्मानंद सहोदर है, साहित्य वह सूरम्य रचना है, जो हृदय से निकल कर हृदय को ही प्रभावित करती है। साहित्य और सामाजिक जीवन का अन्योन्याश्रित संबंध रहा है। समाज जीवन, सामाजिक चेतना, सामाजिक परिवेश के साथ उसके बदलते चित्र को भी अंकित करने का कार्य साहित्य में हो रहा है। साहित्य समाज का दर्पण है। 'दलित' का शाब्दिक अर्थ है कुचला हुआ। दलित अर्थ व्यापक रूप में पीड़ित के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। आज के संदर्भ में दलित का अर्थ होगा वह जाति या समुदाय जिसका अन्यायपूर्ण समाज व्यवस्था के कारण सवर्णों या उच्च जातियों द्वारा दमन हुआ है। जिनको दूषित किया गया है, रौंदा गया है। इस प्रकार दलित वर्ग में वे सभी जातियां सम्मिलित हैं, जो जातिगत सोपान क्रम में निम्न स्तर पर है और जिनको शताब्दियों से दबाकर रखा गया है। देशकाल के अनुसार दलित जातियों को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है। जिनके लिए शुद्र, अछतू अंत्यज, हरिजन, अनुसूचित जातिर्यो आदि शब्दों का प्रयोग होता रहा है। साहित्य किसी जाति, धर्म या वर्ग का साहित्य नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता की बात करने वाला साहित्य है। साहित्य ब्रह्मानंद सहोदर है, साहित्य वह सूरम्य रचना है, जो हृदय से निकल कर हृदय को ही प्रभावित करती है। साहित्य और सामाजिक जीवन का अन्योन्याश्रित संबंध रहा है। समाज जीवन, सामाजिक चेतना, सामाजिक परिवेश के साथ उसके बदलते चित्र को भी अंकित करने का कार्य साहित्य में हो रहा है। साहित्य समाज का दर्पण है। 'दलित' का शाब्दिक अर्थ है कुचला हुआ। दलित अर्थ व्यापक रूप में पीड़ित के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। आज के संदर्भ में दलित का अर्थ होगा वह जाति या समुदाय जिसका अन्यायपूर्ण समाज व्यवस्था के कारण सवर्णों या उच्च जातियों द्वारा दमन हुआ है। जिनको दूषित किया गया है, रौंदा गया है। इस प्रकार दलित वर्ग में वे सभी जातियां सम्मिलित हैं, जो जातिगत सोपान क्रम में निम्न स्तर पर है और जिनको शताब्दियों से दबाकर रखा गया है। देशकाल के अनुसार दलित जातियों को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है। जिनके लिए शुद्र, अछतू अंत्यज, हरिजन, अनुसूचित जातिर्यो आदि शब्दों का प्रयोग होता रहा है।
