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अंतर्राष्ट्रीय कराधान संधियाँ और भारतीय व्यवसाय

कैलाश शुक्ला

सहायक प्राध्यापक

WitWaves Journal of Multidisciplinary Research, Volume 1, Issue 3, 2024, 83e83fbd-f951-4b53-9a01-9a8453903b3c

Published: 11 December 2024

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Abstract

वैश्वीकरण, उदारीकरण और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। वर्तमान समय में भारतीय कंपनियाँ विश्व के अनेक देशों में निवेश, उत्पादन, सेवा एवं व्यापारिक गतिविधियाँ संचालित कर रही हैं। ऐसी स्थिति में विभिन्न देशों की कर प्रणालियों के कारण दोहरे कराधान (Double Taxation) की समस्या उत्पन्न होती है, जो व्यापार की लागत बढ़ाने तथा निवेश को प्रभावित करने का कार्य करती है। इस समस्या के समाधान हेतु देशों के मध्य अंतर्राष्ट्रीय कराधान संधियाँ (Double Taxation Avoidance Agreements - DTAAs) स्थापित की जाती हैं। भारत ने 90 से अधिक देशों के साथ दोहरे कराधान से बचाव संबंधी संधियाँ की हैं, जिनका उद्देश्य करों की दोहरी वसूली को रोकना, सीमा पार निवेश को प्रोत्साहित करना, कर चोरी एवं कर अपवंचन पर नियंत्रण स्थापित करना तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक सहयोग को सुदृढ़ बनाना है। इसके अतिरिक्त OECD तथा G20 द्वारा विकसित BEPS (Base Erosion and Profit Shifting) परियोजना, Multilateral Instrument (MLI) तथा वैश्विक न्यूनतम कर (Global Minimum Tax) जैसी व्यवस्थाएँ भी अंतर्राष्ट्रीय कराधान के स्वरूप को परिवर्तित कर रही हैं। यह शोध पत्र अंतर्राष्ट्रीय कराधान संधियों की अवधारणा, उद्देश्य, कानूनी आधार, भारतीय कर प्रणाली में इनके महत्त्व, भारतीय व्यवसायों पर इनके प्रभाव, चुनौतियों तथा भविष्य की संभावनाओं का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

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